[Chorus: Prem Bhushan Ji Maharaj]
पता नहीं किस रूप में आकर नारायण मिल जाएगा
निर्मल मन के दर्पण में वह राम के दर्शन पाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर नारायण मिल जाएगा
निर्मल मन के दर्पण में वह
राम के दर्शन पाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर नारायण मिल जाएगा
निर्मल मन के दर्पण में वह
राम के दर्शन पाएगा
[Verse 1: Narci]
सांस रुकी तेरे दर्शन को, न दुनिया में मेरा लगता मन
शबरी बनके बैठा हूँ मेरा श्री राम में अटका मन
बेक़रार मेरे दिल को मैं कितना भी समझा लूँ
राम दरस के बाद दिल छोड़ेगा ये धड़कन
काले युग प्राणी हूँ पर जीता हूँ मैं त्रेता युग
करता हूँ महसूस पलों को माना ना वो देखा युग
देगा युग कलि का ये पापों के उपहार कई
छंद मेरा पर गाने का हर प्राणी को देगा सुख
हरी कथा का वक्ता हूँ मैं, राम भजन की आदत
राम आभारी शायर, मिल जो रही है दावत
हरी कथा सुना के मैं छोड़ तुम्हें कल जाऊंगा
बाद मेरे न गिरने न देना हरी कथा विरासत
पाने को दीदार प्रभु के नैन बड़े ये तरसे हैं
जान सके न कोई वेदना रातों को ये बरसे हैं
किसे पता किस मौके पे, किस भूमि पे, किस कोने में
मेले में या वीराने में श्री हरी हमें दर्शन दे
पता नहीं किस रूप में आकर नारायण मिल जाएगा
निर्मल मन के दर्पण में वह राम के दर्शन पाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर नारायण मिल जाएगा
निर्मल मन के दर्पण में वह
राम के दर्शन पाएगा
पता नहीं किस रूप में आकर नारायण मिल जाएगा
निर्मल मन के दर्पण में वह
राम के दर्शन पाएगा
[Verse 1: Narci]
सांस रुकी तेरे दर्शन को, न दुनिया में मेरा लगता मन
शबरी बनके बैठा हूँ मेरा श्री राम में अटका मन
बेक़रार मेरे दिल को मैं कितना भी समझा लूँ
राम दरस के बाद दिल छोड़ेगा ये धड़कन
काले युग प्राणी हूँ पर जीता हूँ मैं त्रेता युग
करता हूँ महसूस पलों को माना ना वो देखा युग
देगा युग कलि का ये पापों के उपहार कई
छंद मेरा पर गाने का हर प्राणी को देगा सुख
हरी कथा का वक्ता हूँ मैं, राम भजन की आदत
राम आभारी शायर, मिल जो रही है दावत
हरी कथा सुना के मैं छोड़ तुम्हें कल जाऊंगा
बाद मेरे न गिरने न देना हरी कथा विरासत
पाने को दीदार प्रभु के नैन बड़े ये तरसे हैं
जान सके न कोई वेदना रातों को ये बरसे हैं
किसे पता किस मौके पे, किस भूमि पे, किस कोने में
मेले में या वीराने में श्री हरी हमें दर्शन दे
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